Rural Sociology

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By Super Admin Posted on Dec 8, 2025
In Category - Extension
डॉ. ओमप्रकाश परगनिहा, डॉ. प्रशांत कुमार बिझेकर 978-93-49895-32-4 Agro India Publications 2026
B.Sc Agriculture, M.Sc Agriculture
1 255 Hindi India

प्राचीन काल से ही ग्रामीण जीवन भारतीय सभ्यता की नींव रहा है और आगे भी निरंतर बना रहेगा। यहीं पर परम्पराएं संरक्षित रहती है, समुदाय आपस में गहराई से जुड़े रहते हैं और हमारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की जड़ें मजबूती से पनपती है। ग्रामीण भारत केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है अपितु यह एक जीवनशैली है जो सदियों से चली आ रही रीति-रिवाजों, सामाजिक संस्थाओं और भूमि तथा प्रकृति से गहरे संबंध से आकार लेती है। कृषि इन समुदायों की जीवन रेखा है जो उनकी आर्थिक स्थिरता, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करती है। अत: भारत को विकसित देशों की श्रेणी में लाना है तो कृषि का विकसित होना अत्यंत आवश्यक है जो कृषि शिक्षा से ही संभव प्रतीत होता है।
कृषि शिक्षा और विस्तार में केवल तकनीकी दक्षता ही पर्याप्त नहीं है। क्योंकि एक उत्कृष्ट कृषि वैज्ञानिक भले ही अत्यधिक उत्पादक फसल किस्म एवं नवीनतम कृषि तकनीक विकसित कर लें, अगर यह किसानों की समस्या समाधान के अनुरूप नहीं है तथा किसान सामाजिक रूप से तैयार नहीं है या मनोवैज्ञानिक रूप से प्रेरित नहीं है तो नवाचार अपनी पूरी क्षमता के साथ गणतव्य तक नहीं पहुँच पाएगा। इसी प्रकार एक विस्तार कार्यकर्ता के पास भले ही सही जानकारी हो, लेकिन यदि वह इसे उस तरह से संप्रेषित नहीं कर सकता हो जो ग्रामीण लोगों के विश्वासों, आवश्यकताओं और क्षमताओं के अनुरूप हो तो उसका प्रयास प्रभावी नहीं होगा। अत: इन परिस्थितियों में कृषि एवं ग्रामीण विकास हेतु प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए व्यक्ति के पास केवल कृषि का तकनीकी ज्ञान ही नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और शिक्षा को आकार देने वाले सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक पहलुओं की समझ भी होनी चाहिए।
लेखकों द्वारा कृषि एवं ग्रामीण विकास में समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान के अवधारणाओं तथा मूलभूत तथ्यों के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की षष्ठम डीन कमेटी पाठ्यक्रम अनुसार हिन्दी में लिखी पुस्तक ‘ग्रामीण समाजशास्त्र एवं शैक्षिक मनोविज्ञान‘ प्रस्तुत की गयी है। मुझे पूर्ण आशा है कि यह पुस्तक कृषि स्नातक पाठ्यक्रम छात्रों, शिक्षकों एवं विस्तार कार्यकर्ताओं के लिए एक विश्वसनीय शैक्षणिक स्त्रोत, व्यावहारिक क्षेत्रीय मार्गदर्शिका और प्रेरणा सिद्ध होगी जिससे वे ग्रामीण विकास को एक मानव-केंद्रित दृष्टिकोण से देख सकेंगे। मैं लेखकों को उनकी सराहनीय प्रयास एवं इस ज्ञानवर्धक पुस्तक के प्रथम संस्करण के प्रकाशन हेतु शुभकामनायें प्रेषित करता हूँ।

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